sanskrit shloka from bhagavad gita

मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! Shrimad Bhagavad Gita - Chapter 1 - Shloka 23 https://youtu.be/Kg_JB21_wRc Gita is the manifest quintessence of all the teachings of the Vedic scriptures" - Adi Sankara "When I read the Bhagavad-Gita and reflect about how God created this universe everything else seems so superfluous" - Albert Einstein "When disappointments stare me in face & I see not one ray of hope, I turn to Bhagavad-Gita. Srimad Bhagavad Gita ( Sanskrit, Hindi & English ) Topics Bhagavad Gita, Geeta, Bhagvad Geeta, Bhagvad Gita, Gita, Mahabaharat, Hindu, Hinduism, Vedic, Epic, Krishna, Arjuna Collection opensource Language English. Jahrhundert v. Chr. The Sloka number has to be typed into the box. Bhagavad Gita - Gita shloka with Hindi meaning Bhagavad Gita Slokas (भगवद् गीता श्लोका) The Bhagavad Gita is part of the Hindu epic Mahabharata. By ReSanskrit on May 6, 2018. Students, including Muslims of Vivekanand Sanskrit Higher Secondary School in Wazirganj of Gonda district, not only recite Sanskrit hymns with impeccable pronunciation but also sing ‘shloka’ from the Bhagavad Gita with remarkable clarity. I have just read the masterly ‘The Bhagavad Gita for Millennials’ by Sh. See more ideas about bhagavad gita, gita quotes, sanskrit quotes. Die Bhagavad Gita (Sanskrit, f., भगवद्गीता, gītā – Lied, Gedicht, bhagavan – der Erhabene, Gott; „der Gesang des Erhabenen“), verkürzt auch nur Gita, ist eine der zentralen Schriften des Hinduismus.Sie hat die Form eines spirituellen Gedichts.Der vermutlich zwischen dem 5. und dem 2. Still, in this verse, King Dhritarashtra … हे जगन्निवास! See more ideas about bhagavad gita, gita quotes, sanskrit quotes. How Six Sigma Paves your Way Towards Success in Business? Required fields are marked *. Interpretation: As work is worship(God), the knowledge within the books is God, the good efforts are also God, so the Yajna is God. If you select the default setting for the sloka, the Sloka selected for today will be returned. As noted in the book, it is not a translation or a commentary. Large size due to high quality sound. आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ ।, चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥, भावार्थ :चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।, आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी।तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥, भावार्थ :संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक ।, अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः । यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः ॥कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्‌ । तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्‌ ॥3.14-15॥, भावार्थ :सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं, अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है। कर्मसमुदाय को तू वेद से उत्पन्न और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जान। इससे सिद्ध होता है कि सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है ।, बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥10.4-5॥, भावार्थ :निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ।, अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते । भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥8.3॥, भावार्थ :श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है ।, यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ॥6.4॥, भावार्थ :जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है ।, तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥6.23॥, भावार्थ :जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है ।, यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । |आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥3.17॥, भावार्थ :परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है ।, प्रकृतेर्गुणसम्मूढ़ाः सज्जन्ते गुणकर्मसु । तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत्‌ ॥3.29॥, भावार्थ :प्रकृति के गुणों से अत्यन्त मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते हैं, उन पूर्णतया न समझने वाले मन्दबुद्धि अज्ञानियों को पूर्णतया जानने वाला ज्ञानी विचलित न करेै ।, सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते ।ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥14.11॥, भावार्थ :जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है ।, यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ ।तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते ॥, भावार्थ :जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है ।, कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ ।रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌ ॥, भावार्थ :श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है ।, मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते ॥, भावार्थ :जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता हैूँ ।, यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥, भावार्थ :ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है ।, न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ॥, भावार्थ :परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है ।, नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥5.15॥, भावार्थ :सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं ।, तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥5.17॥, भावार्थ :जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं ।, शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ ।कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥5.23॥, भावार्थ :जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है ।, लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥5.25॥, भावार्थ :जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।, स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥10.15॥, भावार्थ :हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! Eveyone should be well-known of the meaning of the soul as it never die. हे महात्मन्‌! 10 Tattoo Ideas Inspired By Shlokas From Bhagavad Gita. भावार्थ :हे योगेश्वर! हे पुरुषोत्तम! जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है ।, न कर्मणामनारंभान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च सन्न्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति. I salute Lord Krishna, the son of Vasudeva, the one who gives … हे जगत्‌ के स्वामी! Srimad Bhagavad Gita is a 700-verse Sanskrit scripture which is part of the Mahabharata, one of the major Sanskrit epics of ancient India. Shrimad Bhagavad Gita Shloka in Sanskrit. The verse gives four instructions regarding the science of work: 1) Do your duty, but do not concern yourself with the results. Bhagavad Gita – Sanskrit Audio www. सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ ।, कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌. Jan 1, 2021 - Explore Pradeep Kp's board "Bhagavad gita", followed by 1673 people on Pinterest. जो मूढ़ बुद्धि मनुष्य समस्त इन्द्रियों को हठपूर्वक ऊपर से रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मिथ्याचारी अर्थात दम्भी कहा जाता है ।, यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌ । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते. Bhagavad Gita - Grammatical Analysis for Students of Sanskrit resolution of sandhi, grammatical and etymological explanations of each word of श्रीमद्-भगवद्-गीता [śrīmad-bhagavad-gītā] It is considered by many to be one of the world's greatest religious and spiritual scriptures. Hindu and Muslim students sit together to study Vedas, astrology, philosophy and Hindu rituals along with verses from the Gita. Bhagavad Gita Chapter 1 in Sanskrit: View In » English / Sanskrit / Hindi / Telugu / Tamil / Kannada / Malayalam / Gujarati / Bengali / Oriya: Bhagavad Gita Chapter 1 Lyrics in Sanskrit PDF - Bhagavad Gita in Sanskrit, Hindu Spiritual & Devotional Scriptures in Sanskrit | Hindu Devotional and Spiritual Literature in in Sanskrit हे देवेश! Bhagavad Gita Slokas (भगवद् गीता श्लोका ) The Bhagavad Gita is part of the Hindu epic Mahabharata. Each shloka (verse) is explained in detail. An illustration of a horizontal line over an up pointing arrow. Be true to your … It could be postulated that if everything physical such as actions, agent, agency, rewards, etc. Contact Us. An introduction to the Bhagavad Gita along with study resources can also be found here. श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है ।, यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते । सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते. मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ ।. Bhagavad Gita As It Is MP3 Audio Musical Performance 700 Sanskrit Slokas and Telugu Verses online at low price in India on Amazon.in. जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है ।, यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते. Important:All that is in brackets and italicized within the translation has been added by me in order to complete the sense of a particular phrase or sentence. The Bhagavad Gita is universally famous as the treasure of India’s spiritual wisdom. आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ ।, चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी। तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः, चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।, आपदः संपदः काले दैवादेवेति निश्चयी। तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति, संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्व कृत कर्मों के अनुसार) है, ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है। वह न इच्छा करता है और न शोक ।, सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते । ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत, जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है ।, यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌ । तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते, जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है ।, बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः । सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥ अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः, निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति- ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं ।, कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌ । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌, श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है ।, यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः । स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते, श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य-समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है (यहाँ क्रिया में एकवचन है, परन्तु ‘लोक’ शब्द समुदायवाचक होने से भाषा में बहुवचन की क्रिया लिखी गई है।, मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः । सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते, जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता हैूँ ।, यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते । एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति, ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है ।, नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः । अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः, सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं ।, तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः, जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं ।, शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌ । कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः, जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है ।, लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः । छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः, जिनके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चलभाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरुष शांत ब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।, स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम । भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते, हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! 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